आदरणीय बापू ! हम सुनते आए थे कि भारत की आत्मा गांधी है। भारत में गांधी नहीं बल्कि गांधी में भारत है । लेकिन अब आपकी आत्मा ने ही आपको मार डाला है । भारत आपको जीवित नहीं रख सका । अ...
बहुत दिनों से मैं ऐसी शामों का मुन्तजिर हूं जहां पे शब्दों के दो किनारे मेरी कविता की धारा बन कर तेरी आंखों से बह पड़ें । सड़क पे चलते ख़्याल सारे जिनकी पेशानियों में बल पड़...
तुम्हें मालूम है जानां तुम्हें इक नज़्म में लाने को मैं कितने सफर करता हूं ! थके मांदे हुए से शब्द तुम्हारे शहर से जब भी गुजरते हैं बहुत आवाज़ करते हैं । इधर यह आब्ला पाई ख्य...
वही लम्हे कि जब सोने लगें किसी बेसाख्ता सी शाम की तन्हाईयाँ । नशे में चूर होजायें , तेरी पलकों में उतर आयें , बरस जाएँ यह सब बादल । हवाएं चूड़ियाँ बन कर , तेरे हाथों में बस जायें ।...
नुकीले ख्वाब थे कुछ बहुत आँखों में चुभ रहे थे रात तकिये के तले रख के , थपकियाँ देकर सुला दिया था उन्हें । चंद बातें थीं जिनके सब मतलब पिछली बारिश में धुल गये थे । कई यादें थीं त...
मैं अपने कमरे में हूं ? या उलझनों के खामोश जज़ीरे में ? जहां सिलवटें पड़ गई हैं ख्यालों में आंखों और खाबों के दरमियान एक तल्ख़ फासला बिखर गया है । बोसीदा होगए हैं सारे तमन्ना...
गीत ऐसे लिखें जो पुराने ना हों ऐसे सादा हों कोई जबीं चूम ले ऐसे गहरे हों कि रूह से जा लगें ऐसे खामोश हों कि ज़माना सुने ऐसे बा नूर हों कि दिखाई ना दें चांदनी धूप की गुनगुनाहट लिखें सुरमई शाम की सनसनाहट लिखें उसकी यादों की नमकीं तराहट लिखें गीत ऐसे लिखें जो पुराने ना हों उसके होठों से झरते सुनहरे सुखन उसकी बातों के बिखरे हुए बांकपन उजले ख्वाबों को पहना के रेशम लिबास उसकी खामोशियों की समाअत लिखें ।। नजम
मैं एक आखिरी सफर करूंगा उस रोज़ अपनी उलझी हुई हर एक तमन्ना से परे तेरी शरमाई हुई आंखों के नशे में छुप कर आखिरी बार निकल जाऊंगा खुद से बाहर और चुन लाऊंगा बिखरे हुए सब साज़े अदम...
मन कहता है एक गीत लिखूं। ख्वाबों,ख्यालों, गुमानों से निकल कर। इश्क़,वस्ल,हिज्र की तमाम परम्पराएं उलांघ कर। चिलमनें गिरा दूं ख्वाबों की । दर्द की इतनी परतें उगाऊं शब्दों प...
नींद के आखिरी पल में तुम यूं उतर आए हो गोया पहला अंकुर जो फूटे बर्फ बर्फ एहसास की परतें महक जाएं कोहरे की काली सफेद चादर के पीछे यूं पढ़ लेता हूं तुम्हें मानो आंखो के पन्नों ...