सफर

वही लम्हे कि जब सोने लगें
किसी बेसाख्ता सी शाम की तन्हाईयाँ ।
नशे में चूर होजायें ,
तेरी पलकों में उतर आयें ,
बरस जाएँ यह सब बादल ।
हवाएं चूड़ियाँ बन कर ,
तेरे हाथों में बस जायें ।
समय रुक कर तेरी बेचैन साँसों में
थम जाये  ।
मैं अपनी सारी वह बातें ,
जो रास्ता खो देती हैं होठों तक आने का ।
तुम्हारे पर्स में रख दूं ।
तुम्हारी गोद में आराम दूं लम्बी थकावट को ।
तुम्हारी आँखों में रख दूं सारी कच्ची नींदों को ।
और आगे बढ़ जाऊं ।
निकल भागूं मैं अगले ख्वाब के पीछे ।
कभी ठहरें नहीं राहें ।
कभी न ख्वाब पूरे हों ।
सफ़र चलता रहेगा तो
तुम बाक़ी रहोगी , मैं बाक़ी रहूँगा ।।
                        नजम

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