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Showing posts from February, 2018

अपने हिस्से का में !

मैं अपने कमरे में हूं ? या उलझनों के खामोश जज़ीरे में ? जहां सिलवटें पड़ गई हैं ख्यालों में आंखों और खाबों के दरमियान एक तल्ख़ फासला बिखर गया है । बोसीदा होगए हैं सारे तमन्ना...

गीत ऐसे लिखें जो पुराने ना हों

गीत ऐसे लिखें जो पुराने ना हों ऐसे सादा हों कोई जबीं चूम ले ऐसे गहरे हों कि रूह से जा लगें ऐसे खामोश हों कि ज़माना सुने ऐसे बा नूर हों कि दिखाई ना दें चांदनी धूप की गुनगुनाहट लिखें सुरमई शाम की सनसनाहट लिखें उसकी यादों की नमकीं तराहट लिखें गीत ऐसे लिखें जो पुराने ना हों उसके होठों से झरते सुनहरे सुखन उसकी बातों के बिखरे हुए बांकपन उजले ख्वाबों को पहना के रेशम लिबास उसकी खामोशियों की समाअत लिखें ।।                                  नजम