कविता मेरी

तुम्हें मालूम है जानां
तुम्हें इक नज़्म में लाने को मैं
कितने सफर करता हूं !
थके मांदे हुए से शब्द
तुम्हारे शहर से जब भी गुजरते हैं
बहुत आवाज़ करते हैं ।
इधर यह आब्ला पाई ख्यालों की
बहुत ही शोर करती है
तुम्हें तहरीर करने तक ।
कभी ऐसा भी हो मुमकिन
तुम आ जाओ शब्दों में
कि जैसे सांस आती है ।
पलक मारूं मैं बस इक बार
तुम यूं उकर आओ पन्ने पर
कि जैसे धूप पड़ने से कोई गुंचा चटख्ता है।
तुम्हारे अक्स से भर जाए
यकायक आईना मेरा ।
मुकम्मल डायरी बन जाओ तुम मेरी !
जियूं मैं सफहा सफहा रोज़ व शब तुमको ।
तुम्हारे अक्स में मैं भीग जाऊं
तुम्हें तहरीर कर लूं
मैं अपनी रूह के हर एक पन्ने पर ।।
                              नजम

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