अपने हिस्से का में !

मैं अपने कमरे में हूं ?
या उलझनों के खामोश जज़ीरे में ?
जहां सिलवटें पड़ गई हैं ख्यालों में
आंखों और खाबों के दरमियान
एक तल्ख़ फासला बिखर गया है ।
बोसीदा होगए हैं सारे तमन्नाओं के लिबास
उग आयी है दूब चेहरे पर
रास्ते बेसिमतियों में खोए हैं
कोई मेरे भीतर मुझे पुकारे है
ओस पड़ने लगी है शब्दों पर
अपनी चादर उढ़ा दो ख्यालों को
सांस लेने लगें ताकि आवाज़ें
मुझको मुझसे ही छीन कर जानां
अपने हिस्से का मुझको लौटा दो ।।।।
                        नजम

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