कतरा कतरा कविता ....

मन कहता है एक गीत लिखूं।
ख्वाबों,ख्यालों, गुमानों से निकल कर।
इश्क़,वस्ल,हिज्र की तमाम परम्पराएं उलांघ कर।
चिलमनें गिरा दूं ख्वाबों की ।
दर्द की इतनी परतें उगाऊं शब्दों पर
खून थूकने लगें मानी पन्नों पर ।
दर्द की ऐसी झीलें उतारूं आंखों में
लाल हो जाएं बर्फीली दिसम्बर की सुबहें ।
नफ़रत आलूद चेहरों को
चांदनी रात की साज़ाएं दूं ।
खौलती चिलचिलाती आंखों में
कतरा कतरा उतार दूं कविता ।।।
                             नजम

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