तुम्हें मालूम है जानां तुम्हें इक नज़्म में लाने को मैं कितने सफर करता हूं ! थके मांदे हुए से शब्द तुम्हारे शहर से जब भी गुजरते हैं बहुत आवाज़ करते हैं । इधर यह आब्ला पाई ख्य...
वही लम्हे कि जब सोने लगें किसी बेसाख्ता सी शाम की तन्हाईयाँ । नशे में चूर होजायें , तेरी पलकों में उतर आयें , बरस जाएँ यह सब बादल । हवाएं चूड़ियाँ बन कर , तेरे हाथों में बस जायें ।...
नुकीले ख्वाब थे कुछ बहुत आँखों में चुभ रहे थे रात तकिये के तले रख के , थपकियाँ देकर सुला दिया था उन्हें । चंद बातें थीं जिनके सब मतलब पिछली बारिश में धुल गये थे । कई यादें थीं त...