प्रतीक्षा में !!!

बहुत दिनों से मैं
ऐसी शामों का मुन्तजिर हूं
जहां पे शब्दों के दो किनारे
मेरी कविता की धारा बन कर
तेरी आंखों से बह पड़ें ।
सड़क पे चलते ख़्याल सारे
जिनकी पेशानियों में बल पड़े हैं
जिनकी कमरें झुकी हुई हैं
जिनके बालों में उजड़े ख्वाबों की फसल पकी है
जिनकी मौहूम हसरतें सब धुंआ धुंआ हैं
बटोर लूं मैं ।
उनकी आंखों में आर्ज़ुओं का
बूंद बूंद आसमान भर दूं ।
चेतना में कई चरागों की लौ उतारूं
पेशानियों में ज़िन्दगी की लकीरें काचूं
ऐसी शामें जो रोशनी की नवीद लाएं
मैं मुन्तजिर हूं ।।
                           नजम

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