प्रकृति का लेखक लड़का


वह एक लड़का जिसकी दुनिया
आसमां से ज़रा बड़ी थी
जहां ना राजा की सरकशी थी
और ना प्रजा की थी बगावत
ना थे जहां सरहदी घरौंदे
जातियों के ना थे बखेड़े
वहां के बाज़ार प्रेम के सिक्कों पे चलते
वहां के शहरी
एक प्यारी सी मुस्कुराहट में
जो भी चाहते खरीद लेते
रोशनियां ठेलों पे बिकती
सब्ज़ियों की तरह लगी थीं
वहां पे कुछ बनावटी नहीं था
खुदा भी एक दम ओरिजिनल था ।
उतर के जब वह ज़मीं पे आया
यहां की कड़वी हवाओं में जब
पहली बार उसने सांस ली तो
उसकी रूह के सफेद जुगनू कराह उठे थे।
उसे यहां सब अजब लगा था
बनावटी था प्यार यां का
दोयम दर्जे की भावनाएं
आदमी एक आंकड़ा था
पूरी दुनिया मोटी मोटी सरहदों में बंटी हुई थी
जिनकी रक्षा ही धर्म होता ।
सरहदों के बाद भी वां कई हदे थीं ।
जुर्म था जिनसे निकल कर सोचना कुछ बोलना ।
वह एक लड़का जिसकी ज़िद थी
रोशनी और गुलाब बोना ।
वह एक लड़का जिसकी ज़िद थी
प्रकृति की मांग भरना
उसकी सूखी हथेलियों में ज़िन्दगी के रंग बोना ।
अजीब ज़िद थी
कि जिसके नीचे दबा हुआ था ।
वह अब नहीं है
पर उसकी सांसों में प्रकृति सांस ले रही है ।।।

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