अम्मी जान के नाम !!
हाय अम्मी
ख़त देखकर चौंकिये मत । फ़ोन नहीं कर सकता था । दिल व दिमाग़ में ख्यालों का जो सुनामी बिफर रहा है उसे संभालने को लफ्ज़ ही जुरअत कर पाते हैं । ज़बान में तो वह यारा ही नहीं । मैं इस सुनामी को लफ़्ज़ों में लपेट कर आपको दे रहा हूँ । मैं जानता हूँ कि आप मेरे ख़त को पढ़ नहीं सकतीं मगर मेरा यकीन है कि किसी अच्छे विद्वान से ज़्यादा समझ ज़रूर जायेंगी । मैं आपको तब से देख रहा हूँ जब मेरा वजूद आपका ही छोटा सा हिस्सा था । आपके सैकरीफाईज़ की दास्तान भी उतनी ही लम्बी है जितनी आपकी ज़िन्दगी । एक बेटी जिसने अपनी माँ को मन भर के देखा भी नहीं । जिसने अपना लड़कपन बालिगों की तरह जिया । जिसने किताबों की जगह घर के कामों से दोस्ती कर ली । फिर जब पत्नी के रूप में आईं तो ज़िन्दगी भर कोई सवाल ही नहीं किया । न पति से , न दुनिया से और न खुदा से । पत्नी भी बनीं तो पत्नियों की तमाम रिवायतों को नकार कर । उसमें न कैसी भी शोखी थी , न कोई मांग थी और न ही कोई उम्मीद । फिर माँ हो गयीं आप । यह वह समय था जब आपका वक़्त भी आपने हम बहन भाईओं के नाम कर दिया । आप हममें जीने लगीं । हमीं में आपने अपना बचपन जिया । वह कटुताएं जो आपने सही थीं हमारे हाथो की लकीरों में न बस जायें इसके लिए आपने अपनी मुठियाँ भींच लीं । मैं आपको एक मां के रूप में ही जानना चाहता हूँ कि यही शब्द आपको ढांप सकता है । पिछले आठ सालों में मैंने हर लम्हे से आपका तार्रुफ़ कराया है । मुझे जानने वाली हर चीज़ पहले आपको जान लेती है । इन सालों में मैं आपसे जितना दूर रहा हूँ उतना ही ज़्यादा क़रीब । हाँ सुस्त हूँ कि आपको कॉल करने में भी कभी कभी हफ्ते लग जाते हैं । आप सोच रही होंगी , आज क्यों ख़त लिखना पड़ा ? आपको पता है न कि बचपन में जब भी मैं डर जाता या बीमार हो जाता आप से चिमट जाता था । आपको छोड़ना नहीं चाहता । मुझे याद है कितनी बार तो यही मेरी दवा हो गई थी । अम्मी आज भी मैं डर गया हूँ । मैं इंसानों की परछाईयों में थोड़ा सा इंसान तलाश रहा हूँ । इन गहरे गहरे लहराते काले सायों ने मुझे डरा दिया है । मैं आँखें भी नहीं बंद कर सकता कि इन सायों ने कुछ नुकीली तस्वीरें मेरी पुतलियों में गाढ़ दी हैं । मुझे दिन के उजाले वहशतनाक लगते हैं और रात के सन्नाटे हौलनाक । इस उजाले और उस अँधेरे में मेरे लिए एक चीज़ कॉमन है । डर ! मैं रास्ता नहीं टटोल पा रहा । मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा । मैं खो गया हूँ इन जाने पहचाने से रास्तों पर । यहाँ शोर बहुत है । हर क़दम पर लाल सियाही से एक सानिहा लिखा जा रहा है यहाँ । इन सनिहों की कोई सरहदें नहीं हैं । यह आज़ाद हैं । इनमें एक चीज़ और भी कॉमन है , पत्थर । पत्थर से अहमद नदीम कासमी की नज़्म याद आरही है । उनकी मानें तो पत्थर ही आज का अंतिम मूल्य है । मैं पत्थर और इन सानिहों की सैल्फी नहीं दिखाऊंगा आपको । इनके मुस्कुराते चेहरों में क़ातिलाना हवस छिपी है जो मानवता की मय्यत पर आखिरी फूल चढ़ा रही है । बहुत मुश्किल है जीने का बहाना ढूँढना । लेकिन आपके एहसास में छुपीं हजारों उम्मीदें हर डर पर भारी हैं । आपने ज़िन्दगी में अपने हिस्से की ही नहीं हमारे हिस्से की भी भरपूर लड़ाई लड़ी है । आपने ख़ामोशी से लड़ी ताकि हम बाआवाज़ लड़ सकें । लेकिन आपकी याद तो आती ही है । हाँ कभी कभी नींद नहीं आती । तब आँखें आपकी गोद ढूँढ लेती हैं और नींद को आपके पहलू में सुला देती हैं ।।
लाजवाब
ReplyDeleteशुक्रिया सर
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